अर्थ: कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्म के फल का हेतु मत बन और तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! सर्दी और गर्मी, सुख और दुख देने वाले इंद्रियों के संयोग अस्थायी हैं। वे आते और जाते रहते हैं, इसलिए हे भारत! उन्हें सहन करना सीखो।
अर्थ: क्रोध से मोह (अज्ञान/भ्रम) उत्पन्न होता है। मोह से स्मरण-शक्ति (स्मृति) भ्रमित हो जाती है। स्मृति भ्रमित होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पूरी तरह पतन हो जाता है।
अर्थ: जो मनुष्य मुझको सब जगह देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, मैं उसके लिए कभी अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता।
अर्थ: हे अर्जुन! सभी धर्मों (कर्तव्यों) का त्याग कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।